Sunday, May 30, 2010

स्वप्न-भंग

वर्षों से मैं रही सोती,
स्वप्न देख हंसती व रोती।
आँखें खुलीं बड़ी देर में,
जीवन की कड़ी दुपहर में।
पगडण्डी सामने सूनी मांग सी पड़ी हैं,
छाँव नहीं जिसपे कोई बस मुरझाये फूलों कि एक लड़ी हैं।
जानती हूँ पड़ेंगे छाले पैरों में,
पर चलना हैं, चलते जाना हैं
क्योंकि
सामने एक फूलवाड़ी हैं दो नन्हें फून्लों की
जिन्हें मैंने अपने दूध से सींचा हैं,
उनको देना है चुम्बन अपना आलिंगन,
ममता का आँगन, पनपने का साधन।
कड़ी दुपहर मेरी है,
उन फूलों की अभी हुई है सुबह,
उन्हें चाहिए छाँव, ममता का आँचल।
दुपहर की धूप में जो मेरी होगी परछाई
उसी की छाया में पनप जायेंगे ये फूल।

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