Tuesday, October 05, 2010

अपराजिता

रही वह अपराजिता
सब टूटने के बाद भी...

उसने बारिश की बूंदों से,
बनाई इन्द्रधनुषी नांव एक.

शीशे के टुकड़ों को जोड़ा,
एक कलाकृति स्वरुप में.

जीवन के बिखरे पन्नों को,
बाँधा एक किताब में।

बहते हुए आंसुओं को,
बहाया ममता की धार में।


और इसलिए भी क्योंकि...
बिछड़े हुए प्रेम को,
समेटा फिर धड़कन के तार में.

2 comments:

Vaanbhatt said...

achchhi lagi. bhai ye to hindustaani naari hi ho sakati hai.

shshukla said...

Sahi pakada PV!