किसी तरह जी के आज,
कल मर जाना है
कोई कवि, कह गया:
"हो गयी है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए"
हर पीर का पीर से जवाब मांगना है,
अपने हर दर्द का जवाब मांगना है।
शीघ्र बीते आज और कल आवे,
जीने का दर्द मीटे और शरीर आराम पावे।
चिर निद्रा के सुख की प्रतीक्षा में,
शिव का जूठा हलाहल डाल प्याले में,
धीरे-धीरे उसे पी जाना है,
फिर ही पीर पिघलेगी और जैसे शिव के केशों से
हिमालय कि गंगा बह निकली थी,
हृदय से मेरे भी एक गंगा निकलेगी.
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2 comments:
koshishain kaamyaab hoti hain.
this is not a modest attempt. it's great effort. dushyant kumar ki prerna hai to rang to layegi hi.
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